उत्तरजीविता के सिद्धान्त पर अनुकूलन या समायोजन का उद्देश्य क्या है?

उत्तरजीविता के सिद्धान्त पर अनुकूलन या समायोजन का उद्देश्य क्या है?

समायोजन का विकास

प्राणीशास्त्रियों ने योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धान्त पर अनुकूलन या समायोजन का उद्देश्य शिक्षा शास्त्र में स्थापित करते है | व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक अपने भौतिक और सामाजिक पर्यावरण के साथ समायोजन करता है । उसकी समायोजन शीलता उसकी और समाज की प्रगति का आधार बनाती है । अत: शिक्षा द्वारा व्यक्ति की समायोजन शीलता का अधिकतम विकास किया जाना चाहिए | कुसमायोजिता व्यक्ति स्वयं और समाज तथा मनुष्यता के लिए घातक होता है | कुसमायोजित व्यक्ति समूह व समाज के लिए अनेकों समस्यायें उत्पन्न करते है । सभ्य समाज की अधिकतम ऊर्जा इन्हें नियंत्रित करने में लग जाती है । अत: समाज तथा व्यक्ति दोनों के विकास के लिए समायोजन अति आवश्यक है । अत: इस उद्देश्य को शिक्षा का केन्द्रीय उद्देश्य होना चाहिये ।।

। प्राय: इस उद्देश्य के आलोचकों ने इसे संकुचित उद्देश्य बताया है क्योंकि मनुष्य सदैव परिस्थितियों के साथ समायोजन ही नहीं करता बल्कि वह उन्हें नियंत्रित भी करता है । अत: व्यक्ति को शिक्षा द्वारा सिर्फ अनुकूलन ही नहीं परिस्थितियों पर नियंत्रण करना भी सीखना होता है ।

परन्तु मनुष्य बहुधा परिस्थितियों के साथ समायोजन करता है उसका और उसके समाज का व्यक्तिगत और समष्टिगत हित उसकी समायोजन शीलता पर निर्भर करता है । कतिपय परिस्थितियों में ही वह पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाने में सक्षम होता है । अत: समायोजन शीलता के विकास के उद्देश्य को नकारा नहीं जा सकता ।।

अवकाश का सदुपयोग

अवकाश का आशय उस समय से है जिसमें कोई नियोजित कार्य न किया जाय । बल्कि सुविधा और स्वेच्छा से कार्य या मनोरंजन द्वारा समय का सदुपयोग किया जाय । रंगनाथन के अनुसार- “अवकाश का तात्पर्य ऐसे समय से है जिसमें व्यक्ति अपनी शारीरिक, आर्थिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी तथा आध्यात्मिक शक्तियों के वशीभूत होकर किसी कार्य को न करें।”
“Lesiure is that time that is unoccupied with force & by physical economic, hygienic and spiritual necessities.” Rangnathan

इस उद्देश्य के समर्थकों का मानना है कि मानव सभ्यता आज जिस विकास के सोपान पर पहुंची है, उसका श्रेय उन लोगों को जाता है, जिन्होंने अपने अवकाश का सदुपयोग कर सृजनात्मक कार्य किये हैं। किसी भी व्यक्ति का उत्थान उसके अवकाश के सदुपयोग पर निर्भर होता है कार्यावस्था के समय वह अपनी समग्र शक्तियों को सृजनात्मक नहीं बना सकता, बल्कि अवकाश के समय ही व्यक्तित्व में समग्रता होती है और सृजन उदगमीत होता है । इसीलिए महानतम अनुसंधान, साहित्य, संगीत को महानतम कृतियाँ अवकाश के समय ही प्रस्फुटित होती हैं । प्राचीन ग्रीक परम्परा में स्कूल शब्द का निहितार्थ वह स्थान या जहां अवकाश के समय लोग एकत्रित होकर परिचर्या करते थे ।

वर्तमान परिवेश में कार्य का विभाजन इस प्रकार हो गया है कि व्यक्ति अपनी समग्रता के कार्यक्षेत्र में भी प्रदर्शित कर सकता है । अवकाश काल को प्राय: विश्राम और मनोरंजन के लिए निर्धारित कर दिया गया है परन्तु आज भी वहीं लोग अधिक सफल होते है जिन्होंने अवकाश के समय को अवकाश न मानकर कार्य के प्रति समग्रता प्रदर्शित की और अवकाश काल में व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों, कला, साहित्य, सौन्दर्यानुभूति दार्शनिक तत्व चिन्तन द्वारा पूर्णता प्रदान की है । वर्तमान में भले ही इसके विधिवत प्रशिक्षण को अस्वीकार किया जाता है और इसे पूर्ण उद्देश्य की श्रेणी में नहीं रखा जाता परन्तु इसके महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि अवकाश का समय जीवन का एक बड़ा भाग होता है, उसे उपयोगी बनाकर व्यक्ति स्वयं और समाज का हित साधन करने में समर्थ होता है | इसीलिए समय की महत्ता का प्रशिक्षण शिक्षा के अन्दर समहित होता है ।

आत्माभिव्यक्ति

व्यक्तिवादी विचारकों का मत है कि मानव प्रतिक्षण स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहता है । इसी आत्म अभिव्यक्ति के माध्यम से वह सीखता है और जो सीखता है उसके पीछे अभिव्यक्ति की पिपासा होता है । अस्तित्ववादी और मनोविश्लेषणवादी विचार धाराओं ने शिक्षा के अन्तर्गत इस उद्देश्य को स्थापित किया है । अस्तित्ववादियों के अनुसार सम्पूर्ण व्यक्तित्व अस्तित्व की सिद्धि के प्रयास से प्राप्त होता है । मनोविश्लेषणवादियों का कहना है कि व्यक्तित्व के जो दुर्गुण होते है वे समुचित अभिव्यक्ति न मिलने के कारण होते हैं । फ्रायड ने मनुष्य की अव्यक्त वासनाओं दवारा भावना ग्रन्थियों के निर्माण और परिणाम स्वरुप कुण्ठा आदि के द्वारा अनेकों विकृतियों के जन्म का सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है ।। यदि शिक्षा के दवारा व्यक्ति को अपनी भावनाओं की समग्र अभिव्यक्ति के अवसर प्राप्त कराये जाये, तो व्यक्ति प्राकृतिक रूप से सीखता और समझता चला जायेगा । इससे बालक की मूल प्रवृत्तियों के स्वाभाविक दिशा प्राप्त होगी उसके व्यक्तित्व का प्राकृतिक विन्यास होगा । अत: शिक्षालय का संगठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वहां बालक को अधिकतम आत्म अभिव्यक्ति के अवसर प्राप्त हों । | इस विचारधारा में व्यक्ति के असीमित स्वतंत्रता की स्वीकृति दी गई है । जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए घातक सिद्ध होती है । आत्माभिव्यक्ति आवश्यक है लेकिन नियंत्रित आत्माभिव्यक्ति ही व्यक्तित्व का विकास है । वार्कर ने ठीक ही कहा है- ‘ सुन्दरता कुरुपता के अभाव से नहीं है, इसी प्रकार स्वतंत्रता नियंत्रणों का अभाव नहीं है ।

“Beauty is not absence of ugliness, so liberty is not absence of restraint.”

सौन्दर्यबोध का विकास

शिक्षा जगत में सौन्दर्य शास्त्रियों का मानना है कि मानव जीवन का उद्देश्य सौन्दर्य का अनुभव है । यदि मनुष्य में इरा कला का विकास नहीं होता तो वह पशु के समान होता है । व्यक्तित्व के सभी अंगों का विकास सौन्दर्यानुभूति के साथ सुचारु और सम होता है । वासनाओं का शोधन करके सौंदर्यानुभूति मनुष्य को मनुष्यता के धरातल पर स्थापित करती है अत: शिक्षा द्वारा व्यक्ति में सौन्दर्यबोध का विकास किया जाना चाहिए ।

सौन्दर्य शब्द के सम्प्रत्यय में भिन्नता पायी जाती है । कोई प्रकृति की नीरवता में, कोई मानव के रुप में कोई साहित्य और कला में सौन्दर्य की उपस्थिति मानता है । सामान्य रूप से जहां सत्यता का अनुभव होता है वहां सौन्दर्य का सृजन होता है । परन्तु सत्य का अस्तित्व तो व्यक्ति के मूल्यों पर आधारित है, अत: सौन्दर्यबोध के लिए मूल्यों के शिक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए । परन्तु यह भी सत्य है कि मानव जीवन की विकास यात्रा सुन्दरता की खोज से प्रारंभ होती है । इसलिए यह जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य है इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मानने में इसे कठिनायी कोई नहीं होनी चाहिए

आत्मानुभूति की प्राप्ति

शिक्षा जगत में आत्मानुभूति, आध्यात्मिक, विकास के अर्थ में देखी जाती है, प्राचीन काल से वर्तमान काल तक मनुष्य स्वयं की खोज करता रहा है । अध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार आत्मा का पूर्ण विकास जीवन का लक्ष्य है । अत: शिक्षा द्वारा वह सारे प्रयत्न किये जाने चाहिए जो आत्मविकास और आत्म अनुभूति में सहायक होते है।

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