विभिन्न आयोगों एवं समितियों के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य क्या क्या थे ?

विभिन्न आयोगों एवं समितियों के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य क्या क्या थे ?

इसीलिए डिवी महोदय ने शिक्षा के उद्देश्यों पर विचार करते समय लिखा है कि शिक्षा का अपना कोई उद्देश्य नहीं होता । बल्कि बालकों, अभिभावकों, अध्यापकों के अपने-अपने उद्देश्य होते है । जिन्हें एकीकृत करके शिक्षा के लक्ष्यों की स्थापना की जाती है । इसी बात को कीटिंग (Keating) महोदय ने कहा है कि शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य का पता लगाना असम्भव है । क्योंकि इसका सार्वभौमिक उद्देश्य होता ही नहीं है ।यह मतभेद इसलिए उत्पन्न होता है कि स्वयं व्यक्ति और समाज में कालगत अनुभवों के साथ परिवर्तन होता रहता है, उनकी आकांक्षायें और आदर्श परिवर्तनशील होते है । अत: सार्वभौमिक सार्वकालिक लक्ष्यों की स्थापना असंभव मान ली गई है परन्तु जिस प्रकार नदी की धारा में प्रतिक्षण परिवर्तन के साथ-साथ एक सत्य (एकता) सदैव विद्यमान रहती है उसी प्रकार व्यक्ति और समाज में निरन्तर परिवर्तन के साथ एक सत्य विद्यमान रहता है उस पर देश और काल का प्रभाव नहीं पड़ता । इसलिए शिक्षा के उद्देश्यों की स्थापना को नकारा नहीं जा सकता । यह आवश्यक है। कि उनमें देश और काल के प्रभाव से परिवर्तन होते रहते है परन्तु परिवर्तन मूलभूत न होकर सतही होते हैं । इसीलिए माध्यमिक शिक्षा आयोगों की रिपोर्ट में कहा गया है | किसी समाज में दार्शनिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक व तात्कालिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित तत्व सक्रिय होकर सामाजिक इच्छाओं के रूप में शिक्षा के उद्देश्य या लक्ष्यों में परिणत हो जाती है ।’

व्यक्तिवादी विचारधारा

शिक्षाशास्त्र ने इस विषय पर अनवरत मतभेद बना रहा है कि शिक्षा के लक्ष्य व्यक्तिगत होते हैं या सामाजिक होते है । व्यक्तिवादी विचारकों ने शिक्षा का अन्तिम परिणाम व्यक्तिगत उन्नति मानकर शिक्षा के उद्देश्यों की स्थापना की है । इनके अनुसार मनोविज्ञान ने व्यक्ति की अवितीय स्थापित कर दिया है । ‘मन’ महोदय ने बालक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में व्यक्तिगत उद्देश्यों की स्थापना की है । अत: व्यक्ति का विकास ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए | प्राचीन काल से अब तक शिक्षा द्वारा व्यक्ति के विकास का प्रयास किया गया है । प्राचीन काल में इसे आत्मलब्धि या मोक्ष कहा जाता था, आज इसे आत्म अभिव्यक्ति या आत्म विकास के नाम से जाना जाता है |

समाजवादी राष्ट्रवादी

डी. राम शक्ल पाण्डेय के शब्दों में – “व्यक्तिगत उद्देश्यों के विपक्ष में समाजवादियों ने सामाजिक लक्ष्यों को, शिक्षा मूल्यों को स्वीकार किया है इनका कहना है कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का एक अंग है । अत: उसके हितों को समाज के हितों में पृथक नहीं किया जा सकता । बल्कि व्यक्तिगत हित सामाजिक हितों में ही व्यापा हित है । अत: शिक्षा के उद्देश्य सदैव सामाजिक होने चाहिए व्यक्तिगत उद्देश्यों का कोई स्थान नहीं हो सकता । इसी संदर्भ में ‘रेमण्ड’ महोदय कहते है कि समाज विहीन अकेला व्यक्ति कल्पना की खोज है।” इसी प्रकार जॉन डीवी ने सामाजिक कुशलता को शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य प्रतिपादित कर अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण प्रस्तुत किया

दोनों विचार धाराओं के उग्र समर्थकों को अन्तत: समन्वय स्थापित करना पड़ता है । क्योंकि व्यक्ति और समाज अलग-अलग नहीं है । बिना व्यक्ति के समाज और बिना समाज के व्यक्ति का अस्तित्व नहीं होता । अत: शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण निम्न रूपों में किया जा सकता है –

(i) व्यक्तिवादी (ii) समाजवादी राष्ट्रवादी (iv)। मानवतावादी  विज्ञानवादी

आदि विचार धाराओं को एकीकृत करके निम्न उद्देश्य स्थापित किये जाते है । माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भी स्वीकार किया है कि – “As Political, Social and economical conditions change and new problem arise, it become necessary to re-examine and re-state clearly the objective which education at each definite stage, Should keep in view.”

राधाकृष्णन कमीशन के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

स्वतंत्र भारत में विश्व विद्यालयी शिक्षा का स्वरूप स्थापित करने के लिए केन्द्रीय शिक्षा सलाह कार बोर्ड और अन्त: विश्वविद्यालय शिक्षा परिषद के सिफारिश पर 1948 में डॉ० राधाकृष्णन के अध्यक्षता में विश्वविदयालय शिक्षा आयोग का गठन किया गया । जिसमें विश्वविद्यालयों शिक्षा के निम्न उद्देश्य बतायें हैं ।

1. विश्वविद्यालयी छात्रों का सर्वांगीण विकास मानसिक व शारीरिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संवेगात्मक करना चाहिए ।

2. ज्ञान व संस्कृति का संरक्षण व उन्नति करनी चाहिए ।

3. व्यक्तियों में जन्मजात गुणों की खोज एवं प्रशिक्षण द्वारा उनका विकास करना चाहिए।

4. दूरदर्शी, बुद्धिमान एवं साहसी नेताओं के निर्माण द्वारा समाज सुधार को बल दिया जाना चाहिए ।

5. ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना जो राजनैतिक, प्रशासकीय एवं व्यवसायिक क्षेत्रों में नेतृत्व कर सकें ।

6. सफल प्रजातंत्र के लिए योग्य नागरिकों का निर्माण करना ।

7. ऐसे विवेकी व्यक्तियों का निर्माण करना जो प्रजातंत्र की सफलता के लिए शिक्षा का प्रसार कर सके ।

8. छात्रों का चरित्र निर्माण करना ।

9. छात्रों में विश्व बन्धुत्व की भावना का विकास करना ।

माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

1952 में डॉ० ए. लक्ष्मी स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग की नियुक्ति की गई आयोग के अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित लक्ष्य बताये गये हैं
1. प्रजातान्त्रिक नागरिकता का विकास 2. कुशल जीवनयापन की कला में प्रशिक्षण 3. व्यक्तित्व का विकास 4. व्यावसायिक कुशलता की उन्नति 5. नेतृत्व के लिए शिक्षा 6. चरित्र निर्माण
7. देश प्रेम की भावना का विकास

कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

भारत सरकार ने शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर व्यापक विचार विमर्श कर सलाह देने के लिए 1964 में डॉ० डी.एस. कोठारी के नेतृत्व में आयोग की नियुक्ति की जिसने राष्ट्रीय पुर्न:निर्माण हेतु शिक्षा के निम्न उद्देश्यों की स्थापना की हैं –

1. उत्पादन में वृद्धि करना ।

2. सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विभाजन करना ।

3. प्रजातंत्र को सुदृढ़ करना ।

4. देश का आधुनिकीकरण करना ।

5. सामाजिक, नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना ।

नई शिक्षा नीति 1986 के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

नई शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा को एक व्यापक चुनौती मानकर तकनीकी युग में प्रवेश करने के लिए शिक्षा के निम्न उद्देश्य सुझाये हैं –
1. प्रजातान्त्रिक नागरिकता का विकास 2. जीवन जीने की योग्यता का विकास 3. व्यक्तित्व का विकास 4. व्यावसायिक कौशल का विकास 5. नेतृत्व का विकास 6. संवेगात्मक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास 7. अन्तरसांस्कृतिक समझ का विकास
8. अन्र्तराष्ट्रीय सद्भावना का विकास 2.3.5 डेलर्स आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य यूनेस्को की रिपोर्ट जिसे ‘Learning Treassure within’ कहा गया हैं में शिक्षा के चार स्तंभ बताये गये हैं जिन्हें शिक्षा के चार आधार भूत उद्देश्य कहा जाता हैं ।
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