नागरिकता की शिक्षा का जन्म कहाँ पर हुआ था?

नागरिकता की शिक्षा का जन्म कहाँ पर हुआ था?

उपरोक्त पांचों दिशाओं में बालक की बाह्य और आन्तरिक शक्तियों का समान विकास शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए | इसी सन्दर्भ में महात्मा गांधी शिक्षा के विषय में कहते हैं- ‘ ‘शिक्षा से मेरा तात्पर्य है, बालक और मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क व आत्मा का उत्कृष्ट विकास।

“By Education I mean an all round drawing out of the best in chile and man-body mind and spirit.” -M.K.Gandhi

शिक्षा के इस लक्ष्य को शिक्षाशास्त्रियों के बीच व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ है । किन्तु इसकी कुछ सीमायें भी है, व्यक्ति की वैयक्तिकता के कारण सभी की शक्तियाँ पृथक-पृथक होती है जिनका वैज्ञानिक विभाजन संभव नहीं होता । प्रत्येक व्यक्ति किसी एक शक्ति का अधिकतम विकास करने में सक्षम होता है । सभी में समान्तर शक्तियों का विकास असंभव होता है । अतः यह उद्देश्य विशिष्टीकृत कला कौशलों के विकास में बाधक सिद्ध होता है । वास्तव में सन्तुलित विकास की सीमा निर्धारण करना संभव नहीं है । अत: सर्वांगीण विकास का स्पष्ट आशय अभी तक सामने नहीं आया है फिर भी शिक्षा का यह लक्ष्य शिक्षा क्षेत्र में व्यापक महत्व प्राप्त करता है ।।

नागरिकता के विकास का लक्ष्य

समाजवादियों ने नागरिकता के लक्ष्य की व्यापक प्रशंसा की है। राज्य समाज का अंग है, प्रत्येक व्यक्ति किसी राज्य या समाज का सदस्य बनकर ही जन्म लेता है । यह सदस्यता उसे कुछ अधिकार प्रदान करती है साथ ही कुछ कर्तव्य भी निश्चित कर देती है । प्रत्येक समाज व राष्ट्र अपनी व्यवस्था (तन्त्र) के अनुकूल नागरिकों का निर्माण करना चाहता है अत: शिक्षा उपक्रम में नागरिकता सम्बन्धी उद्देश्य का जन्म होता है । विश्व के विभिन्न समाजों में अपनी संस्कृति और पर्यावरण के अनुकूल राजव्यवस्था को स्वीकार किया गया है । बालक अपने भावी जीवन में उसी व्यवस्था के अन्तर्गत सक्रिय होने वाला है । अत: स्वयं बालक और समाज व राज्य के उत्थान हेतु नागरिकता का उद्देश्य आवश्यक हो जाता है ।

सामाजिक जीवन का प्रशिक्षण

नागरिकता की शिक्षा वास्तव में अधिकारों का ज्ञान और कर्तव्यों का प्रशिक्षण है । नागरिकता सिर्फ राज्य द्वारा पारित अधिनियमों की पालना नहीं है । बल्कि पालना के साथ उनकी सकारात्मक आलोचना और राज्य तथा समाज के विकास में अपनी सृजनात्मक भूमिका का प्रशिक्षण है । माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952 -53) का कथन दृष्टव्य है| “भारत ने अभी हाल में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त की है, उसने पर्याप्त विचार विमर्श के पश्चात् स्वयं को धर्म निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया है । इसलिए शिक्षा दवारा नागरिकों में ऐसी आदतों, अभिरुचियों और चारित्रिक गुणों का विकास किया जाए जिससे कि वे लोकतांत्रिक नागरिक के दायित्वों का भली प्रकार से निर्वाह कर सकें और उन विघटनकारी प्रवत्तियों को रोक सकें जो व्यापक, राष्ट्रीय एवं धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण के विकास में बाधक है।”

भले ही नागरिकता की शिक्षा का जन्म स्पार्टा और जर्मनी के उग्र राष्ट्रवाद से हुआ है। लेकिन वर्तमान में यह प्रत्येक लोकतांत्रिक और उदारवादी राष्ट्र की अनिवार्यता है, क्योंकि नागरिकता का प्रशिक्षण प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली की रीढ़ है । शिक्षा का यह उद्देश्य कल्याणकारी राज्य की प्राप्ति की दिशा में सक्रिय भूमिका अदा करता है । अरस्तु का कथन हैं। – “हमारा उद्देश्य है उदार शिक्षा के द्वारा अच्छे नागरिक को उत्पन्न करना जो स्वामिभक्त, आज्ञाकारी सहिष्णु तथा न्यायप्रिय हो ।”

नागरिकता का समुचित प्रशिक्षण जीवन की चार दिशाओं से किया जाना चाहिए

1. आर्थिक जीवन का प्रशिक्षण

3. सांस्कृतिक जीवन का प्रशिक्षण

4. राजनैतिक जीवन का प्रशिक्षण

उक्त चारों क्षेत्रों के सघन प्रशिक्षण के उपरान्त व्यक्ति में आर्थिक कुशलता और आत्म निर्भरता सामाजिक समायोजन शीलता, सांस्कृतिक अवयवों के प्रति सम्मान पूर्ण आलोचनात्मक सृजनात्मकता, देश के संविधान के प्रति सम्मान और राष्ट्र की गरिमा का अवबोध विकसित होता है, जिससे राष्ट्र और समाज निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होता है ।

नागरिकता के लक्ष्य की प्राप्ति के समय शिक्षा उपक्रम के सदैव सजग रहना चाहिए, कि उग्रराष्ट्रवाद नागरिकता का पर्याय नहीं है बल्कि मानवता का हित ही इसका साध्य है । एच. एच. हार्न लिखते हैं

राज्य में मानव का नागरिकता स्थान है । चूँकि राज्य समाज की संस्थाओं में से एक संस्था है, और चूंकि मानव के अपने साथियों के साथ सदैव संगठित सम्बन्धों के साथ रहना है। इसलिए नागरिकता को शिक्षा के आदर्श के क्षेत्र से बाहर नहीं रखा जा सकता । ”

“Citizenship is man’s place in the state. As the state is one of the permanent institutions of society and as man must ever live in organized relations with his fellows citizenship cannot be omitted from the.”

पूर्ण जीवन के विकास का लक्ष्य

“उन्नीसवीं सदी में विज्ञान के विकास के साथ शिक्षा क्षेत्र में पूर्ण जीवन के उद्देश्य की स्थापना होती है । हरबार्ट स्पेन्सर ने इसे मूर्त रूप देकर शिक्षा जगत में स्थापित किया है। स्पेन्सर का कहना है “शिक्षा को हमें पूर्ण जीवन के नियमों और ढंगों से परिचित कराना चाहिए । शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य हमें जीवन के लिए इस प्रकार तैयार करना है कि हम उचित प्रकार का व्यवहार कर सके तथा शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का पूर्ण सदुपयोग कर सके।”.

“Education must make us familiar with the laws and ways of complete living. Its most important task is to prepare us for life in such way that we may be able to able to order the ruling of conduct, to treat the body the soul property.” Herbert Spencer

स्पेन्सर के अनुसार शिक्षा द्वारा व्यक्ति का इतना विकास अवश्य किया जाना चाहिए कि वह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आनी वाली समस्याओं का समाधान कर सके, पूर्ण साहस एवं अर्तदृष्टि के साथ उनका समाधान ढूँढे । साथ-साथ उसमें अपने व्यवहार के नियंत्रण एवं उसे सही दिशा देने की क्षमता का विकास हो । इसी सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं|

“शिक्षा का अभिप्राय है मानव का उन्नयन करके उसे पूर्णता प्रदान करना | कतिपय विद्वानों ने सम्पूर्ण जीवन के लक्ष्य को अनिश्चित माना है एवं इसे अमनोवैज्ञानिक व बालक की मूल प्रवृत्तियों का विरोधी बताया है । वास्तव में यह दोष इसलिए लक्षित होता है कि स्पेन्सर महोदय विज्ञान विषयों पर अधिक जोर देते है । व्यक्ति में भौतिक उत्थान को अधिक महत्व देने के कारण बालक के भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास के प्रति इस उद्देश्य के अन्तर्गत रूखा व्यवहार दिखायी देता है । भले ही इसे शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य न स्वीकार किया जाय, फिर भी यह उद्देश्य व्यापक और जीवन के बहुमुखी विकास का रास्ता सुझाता है । शेरवुड और एण्डरसन का कथन उचित ही है “व्यक्ति को जीवन की विभिन्न समस्याओं के लिए तैयार करना-शिक्षा का संपूर्ण उद्देश्य है या होना चाहिए ।”

“The whole objective of education is or should be to prepare the individual to face the various problems of life” Sherwood & Andorson

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