नैतिक और चारित्रिक विकास का लक्ष्य

नैतिक और चारित्रिक विकास का लक्ष्य

संसार में न तो धन का प्रभुत्व है और न बुद्धि का । यदि किसी का प्रभुत्व है तो वह चरित्र और पवित्रता का । शिक्षा के पारम्परिक इतिहास का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है। कि चरित्र निर्माण का लक्ष्य सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया है । अर्थात् शिक्षा द्वारा व्यक्ति में नैतिक सदगुणों का आरोपण किया जाना चाहिए | प्रत्येक समाज के अपने आचारविचार सम्बन्धी कुछ सिद्धान्त और नियम होते है । सामान्यत: इन नियमों का पालन करना नैतिकता है और इन नियमों का पालन करने की आन्तरिक शक्ति चरित्र है । इस प्रकार नैतिकता और चरित्र अभिन्न होते है परन्तु विभिन्न अनुशासनों में नैतिकता और चरित्र की व्याख्या भिन्न-भिन्न तरीके से की गई है । समाज विज्ञान ‘समाज सम्मत आचरण को नैतिकता एवं चरित्र मानता है । मनोविज्ञान चरित्र को अच्छी आदतों का पुंज मानता है। धर्मशास्त्र, इन्द्रियनिग्रह और धर्म सम्मत आचरण को नैतिक चरित्र मानता है । साहित्य में नैतिकता और चरित्र पृथक-पृथक है । चरित्र व्यवहार का संकुल है जो अच्छा या बुरा हो सकता है जबकि लोक सम्मत आचरण नैतिकता है । शिक्षा के क्षेत्र में जब चरित्र और नैतिकता की बात की जाती है तो यहाँ व्यक्तियों के समाज सम्मत आचरण को ही चरित्र कहा जाता है ।

चरित्र और नैतिकता का महत्व

इस प्रकार चरित्र एक प्रकार से व्यक्ति की वैचारिक स्वीकृति है, जो विभिन्न परिस्थितियों में उसके व्यवहार का नियमन करती है । जर्मन शिक्षाशास्त्री हरबर्ट का कहना है। “शिक्षा के समस्त कार्यों को एक शब्द में प्रकट किया जा सकता है और यह शब्द ही नैतिकता।” “The one and the whole work of Education may be summed up in the concept of morality”

Herbert हरबर्ट ने ‘आन्तरिक दृढ़ता और एकता’ को चरित्र कहा है । मानव का आचरण उसकी जन्मजात शक्तियों पर आधारित होता है । जन्मजात प्रवृत्तियों का परिमार्जन शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए । जिससे उसके विचार समाज अनुकूल बन सके । इसके लिए शिक्षा के विभिन्न उपकरणों द्वारा उसमें सदगुणों का विकास किया जाना आवश्यक होता है । अत: शिक्षा द्वारा बालक के अन्दर प्रेम, सहानुभूति दया, सद्भावना और न्याय प्रियता का विकास ही किया जाना अपेक्षित है । सदगुणों का चारित्रीकरण शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए | 1932 में – राष्ट्रीय शिक्षा पर परिचर्या करते समय जब गांधीजी से प्रश्न किया गया कि स्वतंत्र भारत की शिक्षा के क्या उद्देश्य होंगे, तो गांधी ने निःसंकोच उत्तर दिया था ‘चरित्र निर्माण करना । गाँधीजी का कहना हैं- “मैं अनुभव करता हूँ कि संसार के सभी देशों को केवल चरित्र की आवश्यकता है और चरित्र से कम किसी वस्तु की नहीं।

सदगुणों का चारित्रीकरण शिक्षा का मुख्य उद्देश्य

अत: व्यक्ति समाज और राष्ट्र के सर्वोच्च विकास के लिए चरित्र का निर्माण शिक्षा का अति आवश्यक विषय है । परन्तु कुछ विद्वानों ने चरित्र और नैतिकता के संप्रत्यय की अस्पष्टता का प्रश्न उठाया है कि आज तक नैतिकता और चरित्र का सर्वमान्य सम्प्रत्यय स्पष्ट नहीं हो सका, वास्तव में चरित्र और नैतिकता किसी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का व्यक्तिगत होना है जो उसके पर्यावरण, परम्परा और दर्शन के द्वारा विकसित होता हैं अत: इसकी सर्वमान्य परिभाषा भले ही न दी जा सके परन्तु इसकी आवश्यकता जीवन में प्रत्येक क्षण होती है एन. आर. स्वरूप सक्सेना के अनुसार – “जिस देश के नागरिक बड़ो का आदर नहीं करते, जो सत्य नहीं कहते, जो न्याय को न्याय नहीं समझते, जो चोर बाजारी, घूस लेने से धन कमाने में अपना अपमान नहीं समझते उस देश का पतन होना निश्चित है ।”

अत: समाज और राष्ट्र के अस्तित्व के लिए बालकों में चरित्र निर्माण का उद्देश्य शिक्षा का मूल उद्देश्य जाने लगा है ।।

व्यावसायिक विकास का लक्ष्य

शिक्षा व्यवहार के परिमार्जन के साथ कौशलों का विकास करती है, व्यक्ति अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की प्राप्ति के लिए ही शिक्षा उपक्रम में नियोजित होता है । परम्परा से शिक्षा संकल्पना जब से विकसित हुई है, विभिन्न कौशलों में पारंगत करना शिक्षा के उद्देश्य रहे है । यही कौशल व्यक्ति को आजीविका का साधन बनते है, अनौपचारिक शिक्षा के अन्तर्गत तो यह उद्देश्य सदैव विद्यमान रहा है और आज भी है । औपचारिक शिक्षा में इस उद्देश्य का प्रादुर्भाव प्रयोजनवादी दार्शनिक चिन्तन के बाद हुआ । विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन में विशिष्ट आवश्यकता को जन्म दिया है । इस प्रकार शिक्षा में व्यावसायिक कुशलता का उद्देश्य अधिक प्रभावशाली बन गया है । प्रकृतिवादी और प्रयोजनवादी आन्दोलनों ने शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को अधिक शक्तिशाली बनाया है | परतंत्र भारत में भुखमरी और बेरोजगारी का समाधान करने के लिए गांधी जी ने बेसिक शिक्षा द्वारा व्यावसायिक उद्देश्यों की प्राप्ति की संकल्पना प्रस्तुत की । पाश्चात्य सभ्यता में संयुक्त राज्य अमेरिका ने शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को गंभीरता से लिया । वहां सामान्य शिक्षा के साथ-साथ निर्देशन और परामर्श का समानान्तर संगठन खड़ा कर दिया गया जिससे बालक की रुचियों और योग्यताओं के पहले से पहचाना जा सके और योग्य होने पर उसे सम्बन्धित कौशल के व्यवसाय से सन्नध कराकर उसे एक उपयोगी नागरिक बनाया जा सके । यद्यपि शिक्षा के इस उद्देश्य की आलोचना “Bread and Butter Aim White coller Aim” जैसे शब्दों से सम्बोधित करके की गई है । परन्तु यह सत्य है कि रोजगार विहीन शिक्षा शिक्षितों के लिए एक अभिशाप है । अत: सम्पूर्ण शिक्षा योजना में इसे अपना केन्द्रीय उद्देश्य बनाना चाहिये । महात्मा गांधी ने कहा है- ‘ ‘सच्ची शिक्षा को बालक और बालिकाओं के लिए बेकारी के विरुद्ध एक प्रकार की सुरक्षा होनी चाहिए । ”

शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य

“True Education ought to be children a kind of insurance against unemployment” M.K.Gandhi

समन्वित विकास का लक्ष्य

मनोविज्ञान ने व्यक्तित्व को एक इकाई के रूप परिभाषित किया है । शरीर, मन पृथक नहीं है । अत: मानसिक शक्तियों को अलग-अलग विभाजित नहीं किया जा सकता और न ही शरीर और मन को अलग विकास के पायदानों में रखा जा सकता है | व्यक्ति जन्म से जो कुछ प्राप्त करता है, उसका समन्वित विकास शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए | पेस्टालॉजी समन्वित विकास के सन्दर्भ में लिखते है- “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक सांमजस्य पूर्ण तथा प्रगतिशील विकास है ।

“Education is the natural harmonious and progressive development of man’s innate Powers.” Pestalozzi

प्राय: शिक्षा के अन्य उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष को विकसित करने को शिक्षा की उद्देश्य मानते है लेकिन व्यक्तित्व का विकास समग्रता के साथ व्यक्ति की विभिन्न शक्तियों के समन्वित विकास के रूप में होना चाहिए । प्रकृतिवादियों ने इस उद्देश्य को बहुत महत्वपूर्ण माना है । रुसो सहित रविन्द्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी, अरविन्द घोष इसका समर्थन करते है । अरविन्द घोष ने बालक के विकास की पांच क्रियाये बतायी है । जिसका विकास समग्रता से किया जाना चाहिए |

ये क्रियाएं है – | (i) भौतिक (ii) प्राणिक (iii) मानसिक भावात्मक (v) आध्यात्मिक

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