बालक के वैयक्तिक विकास में मनोविज्ञान का क्या महत्व है?

बालक के वैयक्तिक विकास में मनोविज्ञान का क्या महत्व है?

(i) वैयक्तिक दृष्टिकोण –

बालक के वैयक्तिक विकास में जीव शास्त्र का यथेष्ट योग रहता है । क्योंकि बालक के व्यवहार में जैविकीय तत्वों का सीधा प्रभाव रहता है । जन्म जात संस्कारों के अतिरिक्त वातावरण एवं सीखने की क्रिया का भी बालक पर प्रभाव पड़ता है । जब जीव-शास्त्र व मनोविज्ञान दोनों शास्त्र व्यक्ति के अध्ययन को केवल महत्व ही प्रदान नहीं करते हैं, वरन् ब्राऊन के शब्दों में – “जीव-शास्त्र व मनोविज्ञान ने अधिकतर शिक्षा पर प्रभुत्व जमा रखा है ….. विधियों का पाठ्यक्रम और स्कूल का प्रबन्ध तक व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक विचारों पर आधारित है ।” (Until recently biology and psychology have largely dominated education, have been based on psychological concepts of the individual.)

(ii) सामाजिक दृष्टिकोण –

एक व्यक्ति अनेक समूहों व समुदायों का सदस्य होता है । कई लोगों के सम्पर्क में आता है । अपनी सामाजिक संस्कृतियों को आत्मसात करते हुये भी वह एक व्यक्ति से मानव बनने में समर्थ होता है । कुटुम्ब, धर्म, प्रेस, चलचित्र तथा साहित्य आदि सभी व्यक्ति के विकास में योग देते हैं । हम मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी मानते हैं। । अतः समाज के बिना उसका अस्तित्व भी सम्भव नहीं । इसके अलावा शिक्षा भी समाज में निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है ।

इसीलिये यदि हमें शिक्षा का पुनर्संगठन (Re-Organization) या पुर्न-व्यवस्था (Reconstruction) करना है तो हमें अवश्य ही व्यक्ति के परे जाना होगा । शैक्षिक प्रक्रियाओं व पाठ्यक्रम के निर्माण के लिये शिक्षा को घर की परिधि में प्रवेश करना ही होगा, तथा समाज के निकट आना ही होगा एवं सम्पूर्ण समाज का ध्यान रखना ही होगा ।

इसीलिये स्कूल में जो सैद्धान्तिक शिक्षा दी जाती है, उसका सम्बन्ध मनुष्य की पूर्ण शिक्षा से अवश्य ही होना चाहिये । अत: इसके लिये हमें समाज के बारे में भी जानकारी रखनी आवश्यक है ।

वैज्ञानिक आधार

19वीं शताब्दी तक आते-आते विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति हुई और उसका जीवन पर प्रभाव पड़ा । इसके फलस्वरूप शिक्षा में विज्ञान के विषयों को सम्मिलित किया गया और विज्ञान के शिक्षण में रूचि उत्पन्न होने लगी । पाठ्यक्रम में भारी परिवर्तन आया । परम्परागत पाठ्यक्रम में उनका महत्व शिक्षण-विधियों में सुधार आदि वैज्ञानिक प्रवृत्तियों की ही विशेषता रही है ।
विज्ञान ने पाठ्यक्रम में परिवर्तन के साथ-साथ हमारे मनोवृत्ति को मनोवैज्ञानिक बना दिया । शिक्षण में वैज्ञानिक आविष्कारों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ । रेडियो, फिल्म प्रोजेक्टर, रिकार्ड प्लेयर, टेप, दृश्य-श्रव्य सामग्री आदि का प्रयोग बढ़ने लगा । शैक्षिक तकनीक की शुरूआत हुई । जैसे कम्प्यूटर के द्वारा शिक्षण की व्यवस्था आदि । इन सब उपलब्धियों को शिक्षा प्रक्रिया से जोड़ना ही होगा ।

शिक्षा में प्रयुक्त प्रचलित आधारभूत सम्प्रत्यय

शिक्षा के स्पष्ट तथा निश्चित स्वरूप को जानने के लिये शिक्षा व अनुदेश शिक्षण व प्रशिक्षण आदि में अन्तर जानना बहुत आवश्यक है । अपने वास्तविक रूप में शिक्षा मनुष्य के जीवन भर चलने वाली सामाजिक प्रक्रिया है। जिसके द्वारा वह अपने विचार तथा व्यवहार में निरन्तर परिवर्तन करता है | और अनुदेश शिक्षा की इस प्रक्रिया का एक अंग मात्र है । जिसके द्वारा विद्यालयों में आने वाले विद्यार्थियों के ज्ञान अथवा कौशल में नियोजित रूप से वृद्धि की जाती है ।

शिक्षा की प्रक्रिया में प्रत्येक प्राणी जिसके सम्पर्क में आकर सीखने वाला नए अनुभव प्राप्त करता है उसका शिक्षक होता है । जबकि अनुदेश की क्रिया में विद्यालय जाने वाले बच्चे ही शिक्षार्थी होते हैं और उनमें निश्चित ज्ञान व कौशल की वृद्धि हेतु नियुक्त निश्चित व्यक्ति ही शिक्षक होता हैं ।

अनुदेशन

शिक्षा से हमारा तात्पर्य मनुष्य के व्यवहार से अधिक होता है परन्तु अनुदेश का विषयज्ञान की ओर अधिक झुका हुआ होता है । कुछ लोग कहते हैं कि शिक्षा द्वारा मनुष्य में ज्ञान का विकास होता है और अनुदेश द्वारा उसमें ज्ञान थोपा जाता है ।

डी.एल.के. ओड के शब्दों में अध्यापक द्वारा कक्षा में दिया गया तथ्यात्मक एवं आलोचनात्मक ज्ञान अनुदेश कहलाता है । अनुदेशन के अन्तर्गत शिक्षक का वक्तव्य, प्रश्नोत्तर, चर्चा, प्रयोग सभी आ जाते हैं । अनुदेशन शिक्षा का एक अंग है, सम्पूर्ण शिक्षा नहीं । प्रचलित भाषा में हम जिसे पढ़ना कहते हैं वह इसी अर्थ का द्योतक है । अनुदेशन कक्षा में भी हो सकता है कक्षा के बाहर भी । शिक्षक तथा छात्र के बीच पाठ्यक्रमीय ज्ञान के आदान-प्रदान की क्रिया अनुदेशन कहलाती है ।” बट्रेण्डरसेल (Brutrand Russell) के अनुसार, “अनुदेशन प्रक्रिया के अन्तर्गत शिक्षक को विद्यार्थियों में शनैः शनै: कुछ मानसिक आदतों के निर्माण करने का अवसर मिलता है ।” डॉ.एन.आर., स्वरूप सक्सेना ने इस अन्तर को व्यक्त करते हुए कहा है कि जहां शिक्षा का क्षेत्र व्यापक है, क्योंकि वह बालक की जन्मजात शक्तियों का विकास करती है, वहां अनुदेशन का क्षेत्र केवल मानसिक विकास तक सीमित है । शिक्षा में बालक प्रमुख है जबकि अनुदेशन में शिक्षक । शिक्षा की भांति अनुदेशन बालक की रूचि व मानसिक स्थिति का ध्यान नहीं रखता । शिक्षा जीवन के लिए तैयारी करवाती है । जबकि अनुदेशन का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना होता है । शिक्षा निजी अनुभवों के आधार पर अर्जित ज्ञान को स्थायी बनाने पर बल देती है किन्तु अनुदेशन में ज्ञान रटाया जाता है जो स्थायी नहीं होता ।

 विद्यालयीकरण

विद्यालयीकरण हिन्दी शब्द ‘विद्यालय’ तथा अंग्रेजी शब्द ‘स्कूल’ (School) से निर्मित है । स्कूल शब्द की व्युत्पत्ति यूनानी शब्द ‘Skhole’ से हुई है जिसका अर्थ है ‘अवकाश’ (Leisure) जो ‘आत्म विकास’ या ‘ शिक्षा’ हेतु प्रयुक्त किया जाता था । कालान्तर में ये अवकाशालय अर्थात् ‘स्कूल्स’ एक निश्चित योजनानुसार पाठ्यक्रम निश्चित समय में समाप्त करने लगे । स्कूलों के विकास को स्पष्ट करते हुए ए.एफ. लीच ने कहा है, ‘दे विचार, गोष्ठियों अथवा वार्ता स्थल जिनमें रहकर एथेन्स के युवक खेलकूद व व्यायाम तथा युद्ध हेतु प्रशिक्षण में अपना अवकाश का समय व्यतीत करते थे, शनैः शनैः दर्शनशास्त्र एवं उच्चस्तर कक्षाओं के स्कूलों में परिणित होने लगे । अकादमी के सुसज्जित उद्यानों में व्यतीत किए गए अवकाश से स्कूल विकसित हुए | ”
समाजपयोगी नागरिक तैयार करने में इसकी भूमिका का उल्लेख करते हुए जे.एस. रॉस (J.S. Ross) ने स्कूल को इस प्रकार परिभाषित किया है, सभ्य मानव द्वारा ‘स्कूल’ संस्था का आविर्भाव किया जिसका उद्देश्य युवकों को समाज के कार्यकुशल एवं समायोजित सदस्यों की अनुभवों के आधार पर तैयारी में सहायता करना था । “

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