मनोवैज्ञानिकों के निर्देशानुसार अधिगम के विकास के सिद्धांतों का महत्व बताइये

मनोवैज्ञानिकों के निर्देशानुसार अधिगम के विकास के सिद्धांतों का महत्व बताइये

1. जानने का अधिगम (Learning to know):-

जानने के अधिगम का अर्थ है शिक्षा द्वारा लोगों में नवीन ज्ञान ग्रहण करने की योग्यता का विकास करना जिससे वे जीवन भर अपने ज्ञान की वृद्धि करते रहे । विद्यालयों, विश्वविद्यालय द्वारा संक्षिप्त समय के लिए शिक्षा दी जाती है और विद्यालयी शिक्षा के बाद व्यक्ति सीखना बन्द कर देता हैं । यदि विद्यालयों, विश्वविद्यालयों द्वारा थोड़े समय में संक्षिप्त विषयों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता का विकास कर दिया जाये तो व्यक्ति आजीवन अपने को शिक्षित करता रह सकता हैं ।

2. करने का अधिगम (Learning to Do):-

इसका अर्थ केवल व्यावसायिक शिक्षा में निहित कौशलों के विकास से नहीं हैं बल्कि जीवन की विभिन्न स्थितियों से निपटने की क्षमता के विकास से हैं, शिक्षा द्वारा व्यक्ति में करने के अधिगम के विकास द्वारा व्यक्तिगत सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्षेत्रों के विभिन्न कार्यों के सफलतापूर्वक करने की योग्यता के विकास से है | अतः शिक्षा के विभिन्न अवयवों को व्यक्ति में करने के अधिगम अर्थात उद्यमशीलता के विकास पर जोर दिया जाना चाहिए ।

3. इकट्ठा रहने का अधिगम (Learning to live together):-

जीवन का अस्तित्व ही समूह में है एकाकी जीवन असंभव है | यदि इकट्टे रहने की कला का विकास शिक्षा द्वारा किया जा सके तो शिक्षा के कई उद्देश्य प्राप्त हो जाते हैं ।

4. बनने का अधिगम (Learn to be):-

शिक्षा द्वारा स्वयं के परिष्कार की योग्यता का विकास किया जाना चाहिए, जिससे वह अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का बेहतर विकास का सके इससे उत्तरदायित्व सहित दूसरे के व्यक्तित्व का सम्मान, शारीरिक विकास, स्मरण शक्ति, तर्क शक्ति, सौन्दर्य बोध आदि का विकास संभव होगा ।

उपरोक्त स्तंभों पर आधारित शिक्षा जीवन पर्यान्त चलने वाली शिक्षा होगी । जिसमें उक्त अधिगम प्रत्यय सम्पूर्ण शिक्षा की कुंजी का कार्य करेंगे । अतः शिक्षा द्वारा प्रत्येक अधिगम से व्यक्ति इस लायक बन सके कि वह समाज द्वारा प्रदान किये गये सभी अवसरों का लाभ उठा सके ।

 शिक्षा के विभिन्न लक्ष्य

“Education is supposed to develop an integrated human being and to prepare young people to perform useful functions for society and to take part in collective life.But when that society is changing from day to day it is difficult to know how to prepare and what to aim at.” (Jawalar Lal Nehru Azad memorial Lect.P.23) अभी तक हमने शिक्षा के लक्ष्यों की स्थापना व उसके वर्गीकरण का सामान्य अध्ययन कर विभिन्न आयोगों द्वारा निर्देशित लक्ष्यों का अध्ययन किया हैं । अब शिक्षा के विभिन्न लक्ष्यों को पृथक-पृथक रूप में देखना अधिक युक्ति संगत प्रतीत होता हैं जिसका क्रमानुसार वर्णन निम्न हैं।

 शारीरिक विकास का लक्ष्य

मनुष्य एक मनो-शारीरिक प्राणी है शरीर उसके जीवन के समस्त क्रियाओं का आधार है। इसी आधार पर उसका मानसिक, चारित्रिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान व पतन टिका होता है । अत: शिक्षा शास्त्र सदैव शारीरिक विकास को अपना प्राथमिक लक्ष्य स्वीकार करता है । कालीदास का कहना है-“शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम् ।” शरीर संसार के सारे धर्मो (क) का माध्यम है । अत: औचित्य पूर्वक इसका संरक्षण करना चाहिए । भौतिकवादी समाजों में स्वास्थ्य शिक्षा को सर्वोपरि महत्व दिया जाता है क्योंकि वहाँ शारीरिक सुख ही जीवन के लक्ष्य होते है । आध्यात्मवादी समाजों में शरीर को सत्य तक पहुँचाने का साधन माना गया है परन्तु बिना साधन के साध्य तक नहीं पहुंचा जा सकता अत: दोनों प्रकार की समाज व्यवस्था में शरीर के स्वस्थ विकास का उद्देश्य समान रूप से स्वीकारा गया है ।

शारीरिक विकास का आशय कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों का विकास, स्वास्थ्य रक्षा, जन्मजात शक्तियों का विकास एवं उदात्तीकरण माना जाता है । इसके लिए उत्तम स्वास्थ्य के नियम बताये जाते है । व्यायाम, आसन, खेलकूद के साथ स्वच्छता के नियमों का ज्ञान के माध्यम से दिया जाता है | शरीर के अंगों, उपांगों बाह्य व आन्तरिक संरचना, शारीरिकी अन्तःक्रियाओं तथा रोगों और रोगों से बचाव का ज्ञान शिक्षा द्वारा ही बालकों तक पहुँचाया जाता है, जिससे बालक सर्वोत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त कर अपना विकास कर सके ।

परन्तु सिर्फ शारीरिक विकास ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं माना जा सकता । प्राचीन ग्रीक शिक्षा नगर की मान्यता थी कि मनुष्य, शरीर और मन दोनों का समुच्चय है । शरीर और मस्तिष्क दोनों का विकास समान रूप से होना चाहिए । अस्वस्थ व्यक्ति समाज के लिए समस्या बन जाता है इस सन्दर्भ में डब्ल्यू हाल का कथन समीचीन प्रतीत होता है- “अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए उसकी अवहेलना करने का आपको कोई अधिकार नहीं है क्योंकि ऐसा करके आप अपने तथा दूसरों के लिए भार बन जाते है |”

ज्ञानात्मक विकास का लक्ष्य

आदिकाल से शिक्षा ज्ञान या विद्या से सम्बन्धित रही है शिक्षा का परिणाम ज्ञान है। जो शिक्षा द्वारा ही संभव होता है | ज्ञान एक मानसिक शक्ति है अत: ज्ञानात्मक विकास मानसिक विकास को प्रेरित करता है प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार अमृतम् तु विद्या श्वेता अथवा ‘सा विद्या या विमुक्तये इसी बात को ग्रीक परम्परा में सुकरात कहते है ‘ज्ञान ही सदगुण है’ ।

“Knowledge is Virtue” अत: शिक्षा के ज्ञानात्मक लक्ष्य की स्थापना शिक्षा संस्था के जन्मकाल में हो गयी थी इसी तथ्य को अरस्तू ‘ज्ञान ही शक्ति है । ‘Knowledge is power’ कहते है । कोमेनियस के विचार में ‘ज्ञान ज्ञान के लिए’ Knowledge for knowledge की धारणा आयी । परिणामस्वरूप ज्ञानात्मक विकास का उद्देश्य सीमित होने लगा | जब ज्ञान को सिर्फ सूचना संग्रहण या भाषा विकास तक सीमित कर दिया गया, तब इस उद्देश्य की कटु आलोचना प्रारंभ हो गयी । विद्यालय अपना स्वरूप खोने लगे और एडम्स को विद्यालयों को ज्ञान की दुकान कहने को बाध्य होना पड़ा । क्योंकि इस उद्देश्य की प्राप्ति सिर्फ कुछ तथ्यों को रट कर परीक्षा पास करने तक ही सीमित हो गयी ।।

उपरोक्त विरोधाभास ज्ञान के सम्प्रत्यय की अस्पष्टता के कारण आया, क्योंकि इस दौरान ज्ञान शब्द की परिभाषा ही बदल गयी थी पूर्व में ज्ञान के अर्थ में विभिन्न मानसिक शक्तियों का दयोतन होता था, कलान्तर तथ्यों के संकलन या रटने को ज्ञान कहा जाने लगा । वास्तव में यह उद्देश्य अपने आप में पूर्ण और शिक्षा के समस्त उद्देश्यों का स्वयं में समन्वय करने वाला है । ज्ञान की उत्पत्ति ऐन्द्रिक अनुभवों से प्रारंभ होती है । लेकिन यह अनुभव या तथ्य ज्ञान नहीं होते काण्ट ने इन्हें ज्ञान का कच्चा माल कहा है, इनसे उत्पन्न विवेक शक्ति ही व्यवहार का परिमार्जन करती है | ज्ञान के रुप में वहीं अन्त शक्ति ही विवेच्य है जो सम्पूर्ण शिक्षा की समग्र निष्पत्ति है ।। | इसी सन्दर्भ में फैरार कहते हैं।- ‘ज्ञान समझदारी के साथ विवेक है, व्यवस्था के साथ शक्ति है, दया के साथ भलाई है धर्म के साथ सद्गुण, जीवन और शान्ति है ।

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