19 वीं शताब्दी में मनोविज्ञान, व्यवहार के विज्ञान के रुप में स्थापित

19 वीं शताब्दी में मनोविज्ञान, व्यवहार के विज्ञान के रुप में स्थापित

शिक्षा का यह उद्देश्य प्राचीनकाल से शिक्षा को आदर्शवादी दृष्टि प्रदान करता रहा है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक चेतना के विकास के साथ विज्ञानवादियों ने इस उद्देश्य को प्रासंगिक सिद्ध करने का प्रयास किया है । परन्तु प्रकृति के समक्ष मनुष्य अब भी बहुत छोटा है | उसका सारा ज्ञान विज्ञान अपने को परिभाषित करने में समर्थ नहीं है । जहां भौतिक विज्ञानों की सीमा प्रारंभ होती है वहीं से अध्यात्मकता का जन्म होता है । अत: आज भी मनुष्य के चरम सुख और शान्ति के लिए आध्यात्म ही सहज मार्ग है | आत्म साक्षात्कार को पिपासा जीवन की तलाश है ।।
शिक्षा के उक्त उद्देश्यों का अध्ययन करने में यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा के उद्देश्य बहुमुखी है जीवन के जितने क्षेत्र हो सकते है, जीवन में जितने प्राप्तव्य हो सकते है सब के सब शिक्षा के उद्देश्य बनाये जा सकते है । प्रत्येक उद्देश्य की देश, काल, समाज और राष्ट्र के अनुसार व्याख्या होता है जिस प्रकार जीवन के उद्देश्यों को किसी सीमा से बांधा नहीं जा सकता उसी प्रकार शिक्षा के उद्देश्य भी सीमाओं से बंधे हुए नहीं होते । प्रत्येक समाज और राष्ट्र की अपनी विचारधारा शिक्षा के उद्देश्यों के रूप में स्वीकृत होती है।

शिक्षा की प्रवृत्तियाँ

किसी भी अनुशासन के दार्शनिक आदर्शो, विषयवस्तु क्रिया पद्धति के द्वारा उसकी प्रवृत्तियों का निर्माण होता है । सामान्यतया व्यवहारों के आधार पर प्रवृत्तियों का आकलन किया जाता है । अर्थात् विषय के अध्यन-अध्यापन, उद्देश्यों और मूल्यों का समाहार उसकी प्रवृत्तियों में होता है । शिक्षा शास्त्र एक अनुशासन है जो व्यापक, विविधतापूर्ण जटिल एवं परिवर्तनशील संकल्पना है । अत: इसकी प्रवृत्तियों में कालगत विकासमान परिवर्तन दिखायी देता है । अर्थात जिस प्रकार समाज की प्रवृत्तियों में परिवर्तन होता है उसी प्रकार शिक्षा की प्रवृतियाँ भी परिवर्तित होती जाती है ।

शिक्षाशास्त्र के उद्गम की प्रारंभिक अवस्था में इस विषय की प्रवृत्ति दार्शनिक और आध्यात्मिक थी । क्योंकि इसका आधार आस्था, विश्वास और परम्परायें थी । इसलिए इसके उद्देश्यों पाठ्यचर्या, क्रियाविधि और मूल्यों में दार्शनिकता व अध्यात्मिकता वर्तमान होती थी । परन्तु समाज ने उद्देश्यों और मूल्यों में परिवर्तन के साथ साथ 19 वीं सदी में शिक्षा की केन्द्रीय प्रवृत्ति मनोवैज्ञानिक वैज्ञानिक सामाजिक फिर समाहारिक होती गई । विकास के इन भिन्न चरणों में शिक्षा के उद्देश्यों पाठ्यचर्या, शिक्षण विधियों और मूल्यों तथा निहितार्थों में परिवर्तन आया है । परिवर्तन के इसी क्रम को पहचानने और तत्कालिक आवश्यकताओं को लक्षित करने के लिए शिक्षा की प्रवृत्तियों में निरन्तर अनुसंधान होते रहते है । समय-समय पर शिक्षा शास्त्री इसे नवीन दिशा देकर इसके कलेवर को आधुनिकता देते हुए विकसित करते रहते है । वर्तमान में शिक्षा की नवीन प्रवृत्तियों का अध्ययन हो, विभिन्न शिक्षा शास्त्रियो द्वारा निम्न प्रकार से किया गया है ।।

1. शिक्षा की मनोवैज्ञानिक प्रवृति 2. शिक्षा की वैज्ञानिक प्रवृत्ति 3. शिक्षा की समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति   4. शिक्षा की समाहारक प्रवृत्ति

शिक्षा की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति

19 वीं शताब्दी में मनोविज्ञान, व्यवहार के विज्ञान के रुप में स्थापित हुआ, शिक्षा का केन्द्रीय उद्देश्य बालक के व्यवहार परिवर्तन को मान लिया गया, तब शिक्षा मनोविज्ञान पर आधारित होने लगी । व्यवहार को प्रेरित करने वाले जो सिद्धान्त मनोविज्ञान द्वारा स्थापित किये गये, शिक्षा क्षेत्र में उनका व्यावहारिक प्रयोग प्रारंभ हुआ । रूसो की प्रकृतिवादी चिन्तन प्रणाली ने शिक्षा की परम्परागत दार्शनिक प्रवृत्ति को हिला दिया । आज रुसो के कटु आलोचकों ने भी शिक्षकी को बाल केन्द्रित स्वीकार कर लिया है । जब मनोविज्ञान के सिद्धान्तों द्वारा शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम शिक्षा, विधि, अनुशासन, विद्यालय, शिक्षक आदि के नवीन सम्प्रत्ययों का विकास होने लगा, तब बालक के अन्तर्मन में शिक्षा की महत्ता प्राप्त हो गई । अर्थात वर्तमान में बालक के मन, मस्तिष्क, संवेगों, भावनाओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा संगठन की स्थापना की जाने लगी । आज मूल प्रवृत्तियों को दमनीय नहीं माना जाता बल्कि उनके शोधन उदात्तीकरण का प्रयास शिक्षा का कार्य मान लिया गया है ।

मनोविज्ञान की देन

(v) यह प्रवृत्ति विद्यालय को भविष्य की तैयारी का स्थान बनाती है । (vi) यह प्रवृत्ति शिक्षा में इन्द्रिय ज्ञान और निरीक्षण को बल देती है | (vii) । यह प्रवृत्ति निषेधात्मक व दमनात्मक अनुशासन का विरोध करती है । (vii) यह प्रवृत्ति बालक की स्वतंत्रता की रक्षा करती है । बालक के स्वतंत्र निरीक्षणों पर बल देती है ।। (ix) बालकों में शिक्षा दवारा वैज्ञानिक अभिवृत्ति के विकास पर बल देती है ।

इस प्रकार शिक्षा की वैज्ञानिक प्रवृति द्वारा कथित सत्य के स्थान पर प्रयोगों द्वारा स्थापित सत्य को महत्व प्राप्त होता है । सत्य शोधन की प्रयोगात्मक विधि प्राप्त होने से सत्य सर्वसुलभ हो जाता है । अतः दर्शन, साहित्य, कला, संगीत और आध्यात्मकता गौण विषय बन जाते है । जबकि प्राकृतिक विज्ञानों को अधिक महत्व प्राप्त होता है । 2.5.3 शिक्षा की समाज शास्त्रीय प्रवृत्ति
मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति जहाँ व्यक्ति केन्द्रित शिक्षा पर बल देती है वहां समाज शास्त्रीय प्रवृत्ति समाज केन्द्रित शिक्षा पर जोर देती है । इस प्रवृत्ति के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था समाज अपने को स्वस्थ बनाये रखने के लिए करता है | बालक शिक्षा प्राप्त करने के लिए समाज से आता है । शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् ज्ञान का प्रयोग वह समाज में ही करता है । अत: शिक्षा का प्रेरक, संगठक, और प्रभावित होने वाला, समाज है । अत: बालक का विकास समाज की इच्छाओं के अनुसार शिक्षा के माध्यम से किया जाना चाहिए । इस प्रवृति के अनुसार शिक्षा का अर्थ, उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि, विद्यालय, अनुशासन आदि का निर्धारण समाज की इच्छाओं मान्यताओं मूल्यों के आधार पर होना चाहिए | अत: समाजशास्त्रीय विधि बालक का विकास एक योग्य नागरिक के रूप में करना चाहती है । इस प्रवृति के अन्तर्गत वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक प्रवृत्तियां सामाहित हो जाती है । जैसे – क लोकतांत्रिक प्रवृत्ति
ख समाजवादी प्रवृत्ति |

धर्म निरपेक्ष प्रवृत्ति

जो भी प्रवृत्तियों वर्तमान में देश व समाज का प्रतिनिधित्व करती है, समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति में स्वयमेव समाहित हो जाती हैं | समाजशास्त्रीय प्रवृति की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित है(i) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति शिक्षा को एक सामाजिक प्रक्रिया मानती है ।

(ii) समाजशास्त्रीय प्रवृति शिक्षा के सामाजिक उद्देश्यों का समर्थन करती है ।

(iii) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति शिक्षा द्वारा बालक का विकास एक योग्य नागरिक के रुप में करना चाहती है । समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति विद्यालय को समाज का प्रतिनिधि बनाने हेतु विद्यालय एवं समाज में सक्रिय सम्बन्ध स्थापित करना चाहती है ।।

समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति विद्यालय को एक सामाजिक संस्थान के रुप में स्वीकार करती  है।

(vi) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति समाज की आवश्यकताओं और समस्याओं के पाठ्यक्रम में प्रमुख स्थान देती है ।

(vii) समाजशास्त्रीय प्रवृति पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा सामाजिक अनुभवों को श्रेष्ठ स्वीकार करती है।

(viii) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति करके सीखने के साथ-साथ कार्य करने के अवसर कक्षा-कक्ष में आवश्यक मानती है ।

 

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