शिक्षा के आधारों की विवेचना कीजिए

शिक्षा के आधारों की विवेचना कीजिए

स्कूलों को एक विशेष पर्यावरण के रूप में देखते हुए जॉन डीवी का कथन है, ‘ ‘स्कूल एक विशिष्ट पर्यावरण है, जहां एक निश्चित जीवन स्तर व निश्चित प्रकार के क्रिया-कलापों तथा व्यवसायों का प्रावधान इस उद्देश्य से किया जाता है कि बालक का वांछित दिशा में विकास हो सके । ”

इस प्रकार विद्यालयीकरण शिक्षा का औपचारिक रूप है अर्थात् यह शिक्षा के संकुचित अर्थ को प्रकट करता है । विद्यालयीकरण शिक्षा का एक अंग है सम्पूर्ण शिक्षा नहीं । डी. ओड के शब्दों में ‘इसका विवेचन शिक्षा के संकुचित अर्थ में किया गया है । निश्चित अवधि में, निश्चित पाठ्यक्रम, निश्चित विधियों तथा निश्चित व्यक्तियों द्वारा समूह के रूप में दी जाने वाली शिक्षा स्कूलिंग कहलाती है । ” यह विद्यालय में आने से जाने तक की प्रक्रिया है । ”

शिक्षा व शिक्षण

शिक्षा शिक्षण से अधिक विस्तृत शब्द है, क्योंकि इसमें कक्षा के कमरे में दिये जाने वाले अनुदेश के अतिरिक्त अथवा दी गई जानकारी के अलावा शैक्षिक कार्य-कलाप और प्रोग्राम आते हैं । शैक्षिक ट्रिप सामाजिक सेवा कैंप, समुदाय कार्य तथा सह पाठ्यचर्या संबंधी कार्य कलाप शिक्षण का एक महत्वपूर्ण भाग है । परन्तु ये अनुदेश में शामिल नहीं की जाती । शिक्षा, शिक्षण से भी विस्तृत शब्द है, शिक्षण उस समय तक सीमित रहता है जब तक एक बच्चा किसी संस्था में रहता है, परन्तु शिक्षा एक आजीवन प्रक्रिया है । यह उस समय प्रारम्भ होती है जब बच्चा पैदा होता है और उसके जीवन के अन्तिम क्षण तक जारी रहता है ।।

शिक्षा व प्रशिक्षण

प्रशिक्षण औपचारिक रूप से दिया जाता है क्योंकि यह नियमों तथा सिद्धान्तों के निश्चित ढांचे के अनुसार किसी की निगरानी में दिया जाता है । शिक्षा औपचारिक व अनौपचारिक रूप से दी जा सकती है । प्रशिक्षण शिक्षा का ही एक भाग या प्रकार है ।

शिक्षा प्रशिक्षण

2. उद्देश्य

बालक का सर्वांगीण विकास, बालक में | किसी एक या अधिक कुशलता अन्तर्निहित शक्तियों का का विकास

3. अभिकरण औपचारिक व अनौपचारिक दोनों प्रशिक्षण संस्थान-परिवार आदि।

4. शिक्षक औपचारिक व अनौपचारिक अभिकरणों | प्रशिक्षक के सदस्य

5. अवधि जन्म से मृत्यु तक। निश्चित छोटी अवधि

6. स्थान | घर,विद्यालय,समुदाय,पड़ौस आदि प्रशिक्षण संस्था का स्थान,खेत आदि

7. पाठ्यक्रम । | ‘निश्चित व अनिश्चित दोनों ।। निश्चित प्रत्येक क्रिया के उल्लेख

शिक्षा का जीवन में महत्व:

शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया विद्या बुद्धि की जड़ता को हरती (दूर करती) है । वाणी में सत्यता का संचार करती है, मान-सम्मान फैलाती है, पाप कर्मों से दूर रहती है, मन (चित्त) को प्रसन्नता प्रदान करती है, चारों दिशाओं में यश कीर्ति फैलाती है । कल्पलतारूपी विद्या क्या-क्या नहीं करती, अर्थात् सब कुछ कर सकती है ।

भारतीय पौराणिक शास्त्रों में कल्पवृक्ष की कल्पना की गई और यह माना गया कि कल्पवृक्ष से जो इच्छा प्रकट की जाती है, वह वृक्ष उस इच्छा की पूर्ति करता है । यहाँ विद्या को भी इसी कल्पवृक्ष के समान कल्पलता (बेल) माना है । और यह स्वीकार किया गया है कि इस विद्या रूपी कल्पलता से जो कुछ भी इच्छा की जायेगी,. वह यह पूरी करेगा । अर्थात् विद्या मनुष्य की हर कामना को पूरी कर सकती है । मनुष्य विद्या के द्वारा यश, कीर्ति, वैभव आदि सब कुछ प्राप्त कर सकता है ।।

स्वमूल्यांकन प्रश्न

उपनिषद में शिक्षा को ‘सा विद्या या विमुक्तये कहा गया है अर्थात् विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करें अर्थात् शिक्षा से स्वतन्त्रता की प्राप्ति होती है । विद्या अज्ञानता से स्वतन्त्रता दिलाकर ज्ञान प्रदान करती है, संकीर्णताओं से मुक्ति दिलाकर व्यापकता लाती है । जड़ता या स्थिरता से विमुक्ति कर गत्यात्मकता लाती है, विचारों को स्वतन्त्रता प्रदान करती है तथा जीवन के हर क्षेत्र में स्वतन्त्रता पूर्वक सोचने तथा कार्य करने का अवसर प्रदान करती है ।

शिक्षा सांस्कृतिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी अनिवार्य है । शिक्षा समाज की संस्कृति को जीवित रखती है । संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरण करती है । संस्कृति का परिमार्जन करती है तथा संस्कृति को उपयुक्तता प्रदान करती है । आध्यात्मिक उन्नति व मानसिक शक्ति के लिए भी शिक्षा अनिवार्य है ।

शिक्षा मानव जीवन को सुखमय बनाती है । इसमें भौतिक सुख-सुविधाएँ भी प्राप्त होती हैं । आज मानव ने प्रकृति पर जो विजय प्राप्त की है वह भी शिक्षा का परिणाम है । वैज्ञानिक उन्नति तथा सुख सुविधा के लिए विज्ञान द्वारा प्रदत्त उपकरण शिक्षा की ही देन है । रेडियो, चलचित्र, विद्युत, वायुयान, रेलगाड़ियां, उद्योग आदि सब विद्या की ही देन है । शिक्षा ने मानव जीवन के रक्षार्थ अनेक प्रकार की औषधियाँ हमें दी हैं । शिक्षा हमारे जीवन को विकसित करती है । इससे ही हम पशुत्व से ऊपर उठकर ईश्वरत्व के निकट आ जाते हैं ।

 अनुदेशन, विद्यालयीकरण एवं प्रशिक्षण के सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए ।

3. “शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है । ” स्पष्ट कीजिए ।

 सार संक्षेप

बालक के व्यवहार में वांछनीय परिवर्तन के लिए शिक्षा की परम आवश्यकता है । शिक्षा वह प्रकाश है जिसके दवारा बालक की समस्त शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का विकास होता भारतीय मत के अनुसार शिक्षा शब्द संस्कृत की ‘शिक्ष’ धातु से बना है जिसका अर्थ है सीखना या सिखाना ।’ ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् विद्या वही है जो बन्धन से मुक्त करावें ।

पाश्चात्य मतानुसार – शिक्षा का अंग्रेजी पर्याय ‘Education’ शब्द है जिसकी व्युत्पत्ति लेटिन शब्द Educatum या Educare से हुई है । जिसका अर्थ है बाहर निकालना, विकसित करना ।।
प्लेटो के अनुसार ‘ ‘शिक्षा उसे कहते हैं जो सद्गुणों का विकास करती है । ”

संकुचित अर्थ में शिक्षा का स्वरूप औपचारिक होता है अर्थात् वह किसी निश्चित स्थान पर जैसे विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में दी जाती है ।

व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है । शिक्षा वह अनियन्त्रित वातावरण है जिसमें रहते हुए बालक अपनी प्रकृति के अनुसार स्वतन्त्रतापूर्वक नाना प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है ।

यदि हम शिक्षा की विषय वस्तु, स्वरूप विधि तथा उद्देश्यों का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि शिक्षा न केवल कला है और न ही केवल विज्ञान है । अपितु कला व विज्ञान दोनों ही है । शिक्षा के चार आधार है. मनोवैज्ञानिक दार्शनिक, समाजशास्त्रीय तथा वैज्ञानिक शिक्षा में प्रचलित आधारित सम्प्रत्यय है :

शिक्षा, अनुदेशन, विद्यालयीकरण शिक्षण, प्रशिक्षण ।

 मूल्यांकन प्रश्न

शिक्षा के सम्प्रत्यय की व्याख्या करते हुए किसी एक परिभाषा की विस्तृत विवेचना कीजिए |

शिक्षा के संकुचित एवं व्यापक अर्थ की व्याख्या करते हुए शिक्षा के समन्वित अर्थ की चर्चा कीजिए |

शिक्षा से आप क्या समझते हैं । इसकी प्रकृति एवं महत्व बताइए ।

शिक्षा और अनुदेशन में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।

5 शिक्षा, अनुदेशन, विद्यालयीकरण एवं प्रशिक्षण की अवधारणाओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए |

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