शिक्षा के लक्ष्य, प्रवृत्तियाँ (Aims of Education and Tendency) का वर्णन कीजिये

शिक्षा के लक्ष्य, प्रवृत्तियाँ (Aims of Education and Tendency) का वर्णन कीजिये

उद्देश्य

शिक्षा के लक्ष्य निर्धारण

विभिन्न आयोगों एवं समितियों के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

राधाकृष्ण आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य
कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

नई शिक्षा नीति 1986 के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

डेलर्स आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

शिक्षा के विभिन्न लक्ष्य

शारीरिक विकास का लक्ष्य,  व्यवसाय विकास का लक्ष्य 2.4.5 सम विकास का लक्ष्य 2.4.6 नागरिकता के विकास का लक्ष्य 2.4.7 संपूर्ण जीवन के विकास का लक्ष्य 2.4.8 समायोजन का विकास 2.4.9 अवकाश का सदुपयोग 2.4.10 आत्माभिव्यक्ति 2.4.11 सौन्दर्य बोध का विकास 2.4.12 आत्मानुभूति की प्राप्ति शिक्षा की प्रवृत्तियाँ 2.5.1 शिक्षा की मनोवैज्ञानिक प्रवृतियां 2.5.2 शिक्षा की वैज्ञानिक प्रवृतियां 2.5.3 शिक्षा की समाज शास्त्रीय प्रवृतियां 2.5.4 शिक्षा की समाहारक प्रवृतियां

 शिक्षा की आधुनिक प्रवृतियां सारांश मूल्यांकन प्रश्न सन्दर्भ ग्रन्थ

उद्देश्य

इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आप – शिक्षार्थी शिक्षा के लक्ष्यों से अवगत हो सकेंगे ।

• शिक्षार्थी शिक्षा की प्रवृति से अवगत हो सकेंगे ।

• शिक्षार्थी लक्ष्यों और उद्देश्यों में विभेद कर सकेंगे ।

• शिक्षा लक्ष्यों की स्थापना के आधारों से अवगत हो सकेंगे ।

• शिक्षार्थी शिक्षा के लक्ष्यों का वर्गीकरण कर सकेंगे ।

शिक्षार्थी राधाकृष्णन आयोग के शैक्षिक लक्ष्यों से अवगत हो सकेंगे ।

• शिक्षार्थी माध्यमिक शिक्षा आयोग के शैक्षिक लक्ष्यों से अवगत हो सकेंगे ।

• शिक्षार्थी डेलर्स आयोग के शैक्षिक उद्देश्यों से अवगत हो सकेंगे ।

• शिक्षार्थी भारतीय समाज के अनुरूप निर्धारित शैक्षिक लक्ष्यों से अवगत हो सकेंगे ।

शिक्षार्थी शिक्षा की नवीन प्रवृतियों से अवगत हो सकेंगे ।

प्रस्तावना

शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें मनुष्य अपने जीवन को उत्तरोत्तर विकसित करने का प्रयास करता है । विकास के लिए शिक्षा आवश्यक है । दूसरे शब्दों में जीवन को जीने के लिए सीखना अनिवार्य है, जो जितना अधिक और जितना अच्छा सीखता, समझता और व्यवहार में उतारता चला जाता है, वह जीवन के श्रेष्ठतम सोपानों को स्पर्श करता जाता है | इसीलिए मानव समाज में शिक्षा प्रक्रिया के शोधन का क्रम निरन्तर चलता रहता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर व समाज और राष्ट्र अपने स्तर पर शिक्षा के विभिन्न अंगों उपांगों में शोध व अनुसंधान करता रहता है, जिससे व्यक्ति को स्वयं और समाज तथा राष्ट्र के लिए अधिकाधिक उपयोगी बनाया जा सके । । विभिन्न शिक्षा मनीशियों ने शिक्षा को एक सोद्देश्य प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया है । शिक्षा का सर्वव्यापक उद्देश्य व्यक्ति में जीवन की विभिन्न कलाओं को विकसित कर उसे उपयोगी जीवन जीना सिखाना है । जिससे वह स्वयं अपने लिए, अपने परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व तथा अखिल ब्रह्माण्ड के लिए अपनी क्षमता के अनुसार श्रेष्ठतम सिद्धि प्राप्त कर सके ।।

ज्ञानात्मक विकास का लक्ष्य

पृथ्वी पर जब से जानी मानव (होमोसेपियन्स) ने अपना अस्तित्व प्राप्त किया और उसने सृजन के लिए अपने दोनों हाथों को स्वतंत्र कर लिया, उसी बिन्दु से शिक्षा प्रक्रिया का जन्म हो गया और शिक्षा के सिद्धान्तों और उद्देश्यों की स्थापना प्रारंभ हो गयी ।

सी.बी.गुड़ (C.V.Good) के अनुसार – “लक्ष्य पूर्व निर्धारित साध्य होता हैं, जो किसी कार्य या क्रिया का मार्गदर्शन करता हैं ।” Aim is foreseen, that gives direction to an activity.”
शिक्षा की प्रक्रिया एक दीर्घकालीन सतत् प्रक्रिया होती हैं शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार अन्तिम साध्य की प्राप्ति के लिए कुछ छोटे-छोटे उद्देश्यों में अन्तिम लक्ष्य का विभाजन करते हैं। जिन्हें अंग्रेजी भाषा में Objective कहा जाता हैं ।

नैतिक और चारित्रिक विकास का लक्ष्य

इस प्रकार किसी Aim को प्राप्त करने के लिए विभिन्न लघु उद्देश्यों (objective) का निर्धारण किया जाता हैं, जिनकी प्राप्ति किसी कक्षा स्तर, कालांश या विद्यालय में की जा सकती हैं । हिन्दी भाषा में Aims और objective के हिन्दी समानार्थी शब्दों पर मतभेद दिखायी देता हैं । प्रायः: विद्वान Aims को लक्ष्य और objective को प्रत्येक उद्देश्य कहते हैं। परन्तु प्रायः शिक्षा शास्त्री लक्ष्य और उद्देश्य दोनों शब्दों को पर्यायवाची के रूप में प्रयोग में लाते हैं । इस अध्याय में Aims अर्थात लक्ष्यों या साध्यों पर विचार विमर्श किया जाएगा ।

शिक्षा के समग्र स्वरूप का अवलोकन उसकी प्रवृत्ति को निर्धारित करता हैं । प्रायः शिक्षा का उद्देश्य शिक्षा के प्रवृत्ति को निर्धारित करने वाला प्रथम कारक है । शिक्षा अनुशासन अपने जन्म के समय आदर्शवादी उद्देश्यों पर आधारित था तब इसकी प्रवृति आध्यात्मिक थी । कालान्तर में वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक क्रान्ति के कारण इसकी प्रवृति में परिवर्तन हुआ आज शिक्षाशास्त्र समन्वयवादी प्रवर्ति को प्रोत्साहन देने लगा है । इसके लक्ष्यों में आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, प्रयोजनवाद और यथार्थवाद का समन्वय कर इस स्वरूप को समाहारक बनाने का प्रयास किया गया हैं । अतः जैसे-जैसे शिक्षा परिवर्तित होती जाती हैं, उसके उद्देश्य भी परिवर्तित होने लगते है।

शिक्षा के लक्ष्यों का निर्धारण

‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, समाज से इतर मनुष्य सिर्फ एक पशु होता है । मनुष्य को मनुष्य बनने के लिए समाज की आवश्यकता होती है । प्रत्येक समाज पूर्व में अर्जित अनुभवों को अपनी सन्ततियों में स्थानान्तरित करना चाहता है । जिससे सन्ततियाँ अपेक्षाकृत अधिक सुगम जीवन प्राप्त कर सकें इसी जैविक अपेक्षा के द्वारा औपचारिक (Formal), अनौपचारिक (informal), निरौपचारिक (nonformal) शिक्षा का जन्म होता है । मनुष्य और समाज की यही अपेक्षा शिक्षा के उद्देश्यों का मूल है । समस्त शैक्षिक उद्देश्य इसी मूल से उद्भासित होते है | व्यक्ति और समाज की अपेक्षायें उसके पर्यावरण के दवारा संघर्षित होकर दार्शनिक सिद्धान्तों को प्रतिपादन करती है । व्यक्ति अथवा समाज का दर्शन वास्तव में उसके पर्यावरण के संघर्षण से उत्पन्न होती है | व्यक्ति व समाज का दर्शन कुछ आदर्श और पूर्व मान्यताओं को स्थापित करता है । यही दार्शनिक आदर्श शिक्षा के लक्ष्यों के रूप में स्थापित होते है । विश्व के भिन्न-भिन्न समाजों में शिक्षा के लक्ष्यों का निर्धारण भिन्न-भिन्न होता है, जैसे-अमेरिकी समाज प्रयोजनवादी होने के कारण वही की शिक्षा का उद्देश्य व्यवसाय प्रधान है । प्राचीन भारतीय शिक्षा, आदर्शवादी होने के कारण प्राचीन भारतीय शिक्षा मोक्ष प्रधान थी, इसी प्रकार साम्यवादी राष्ट्रों की शिक्षा का लक्ष्य साम्यवादी लक्ष्यों की स्थापना होता है |

शिक्षा शास्त्रियो ने शिक्षा के उद्देश्यों का विभाजन उद्देश्यों के निर्धारक तत्वों के आधार पर किया है परन्तु व्यक्ति स्वयं, समाज, राष्ट्र, विश्व व ब्रह्माण्ड में एक साथ अस्तित्व धारण करता है । अत: प्रत्येक आधार पर निर्धारित उद्देश्य पृथक-पृथक न होकर आपस में सामंजस्य लिए होते है । अत: शिक्षा के उद्देश्यों को पृथक-पृथक इकाई के रूप में न देखकर संयुक्त रूप से देखा जाना चाहिए |

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